लाशों के कारोबार

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लाशों के कारोबार

लाशों के कारोबार
कमान संभाले हुए!
चार साल ना हुए विकास!
ना आए अच्छे दिन!
ना बचा बोलने को अब कुछ और!
घूम लिया मैने पूरी दुनियां!
अब का कहें सौवाँ सौ कड़ोर जनता को!
अब बेड़ा पार लगाएं अस्थि!
अब चुग गया चिड़ियाँ!
अब तो लाशों से व्यपार बढ़ाते हैं!
चाय बेचकर बन गया मैं मुखियां!
अब लाशों की राख से बन जाऊँगा मुखियां!
वर्ल्ड कप के सम्मान करते हैं अस्थि के साथ अंध भक्त सेल्फी-सेल्फी!…
– प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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