ज़िन्दगी का दौर

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ज़िन्दगी का दौर

By |2018-08-30T10:30:59+00:00August 30th, 2018|Categories: कविता, व्यंग्य|Tags: , |0 Comments

ज़िन्दगी का दौर निरालें है
एक तरफ ज़िन्दगी एक तरफ मौतों का सफ़र!
सब जानते हैं लोग यहाँ फिर भी झूठ बोलते हैं!

कोई अपने रिश्तेदारों से त्रासदी है!
कोई अपने घर की जी जंजाल से!

अपनी-अपनी करनी से सब बेहाल है
सब को आराम भरा जीवन पसंद है

सभी को अपनी सिर्फ अपनी पड़ी है
देश के बारे में आज कोई नही सोचता है

सब को धन सम्पति और समाज में प्रतिष्ठा की पड़ी है
कोई देश के बारे में आज देश के लिए सोचता हैं!

सब सिर्फ अपनी होड़ में लगे हुए है
चाहे वें युवक वर्ग हो या राजनेता हो

सब अपनी झूठी जीवन जीने में खुद से व्यस्त है
आज का ये हाल है जीवन जीना कितना मुश्किल है

ज़िन्दगी के सफ़र में अपने हाथ से निकलतें जा रहे हैं
सब जानते हैं कि मोह और नाम से कुछ नही मिलता

ज़िन्दगी के दौर में थक गया हूँ मेरे देशवासियों
खुद के जीवन का आधार बादलों ताकि आने वाले वर्ग बदले!
प्रेम प्रकाश
29/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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