दो परिवारों की व्यथा

दो परिवारों की व्यथा

काँप रही थी माँ सदमा ऐसा लगा था

पिता जैसे जीते जी मर ही गया था

निकल रहे थे अंगारे भाई की आँखों से

दिन में भी घर में अंधेरा घना था।

अड़ोस पड़ोस में चर्चा हो रही थी

दर्द ऐसा था कि हर आँख रो रही थी

क्योंकि घर की बेटी विकृत अवस्था में पड़ी थी।

ना जी रही थी ना मर रही थी

किस्मत को अपनी कोस रही थी

ढांढ़स बंधाने आए थे कई

समझा रहे थे बुझा रहे थे।

एक बुजुर्ग दम्पत्ति भी वहां आए

देखकर वह दृश्य वो बहुत घबराये

दे रहे थे बद्दुआ उस दुष्ट पापी को

किया है जिसने ये हाल

इस घर की ज्योति का

नहीं छोड़ेंगे उसे ज़िंदा

कहां है वह उसे ढूंढ़ कर लाओ।

तभी अचानक बाहर से कुछ आवाज़ आई

ज़ंजीरों में पकड़कर

पुलिस किसी को लेकर आई

देखकर चेहरा स्तब्ध रह गए सब

मौत देने वाले दम्पत्ति बेहोश हो गए तब।

होश आने पर भी वह अधमरे ही थे

करतूत देखकर अपने ख़ून की शर्म से वह गढ़ गए थे।

पाला था इस उम्मीद में

बड़ा होकर माँ बाप का नाम रोशन करेगा

भटक गए होंगे जो

उन्हें रास्ता दिखाकर पथ प्रदर्शक बनेगा

पर यह तो ख़ुद ही भटक गया

पाप के दलदल में अटक गया।

जो किया है पाप इसने

उसका भार हम सह न पाएँगे

इस दुनिया को अपना मुँह दिखा न पाएँगे।

कोई माँ बाप ऐसी औलाद नहीं चाहता

जो पता होता तो आस्तीन में सांप नहीं पालता।

हो गई ज़िन्दगी पूरी हमारी

ख़ुद से ही नफ़रत हो गई

अब तो इंतज़ार उस पल का है

जब जहाँ से रुख़्सत करेंगे

और ऊपर वाले से ये कहेंगे

बेटी का यह दर्द देख नहीं सकते

और बेटे का यह पाप सह नहीं सकते।

इसलिये हे प्रभु अब जो हमें जन्म देना

तो बेऔलाद ही रहने देना

अब जो हमें जन्म देना

तो बेऔलाद ही रहने देना।

.रत्ना पांडे

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