प्रकृति का कहर

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प्रकृति का कहर

प्रकृति का कहर

आज हम प्रकृति का कहर
हम पे दिन प्रति दिन धाएँ!

हम सब प्रकृति के कृतिम
बनाने को लालाइत है!

हम जंगल, जमीन को नष्ट
करने को लालाइत हो गए!

आज क़ुदरत अपना जलवा
बिखरने को आतुल हो गया!

प्रकृति के साथ हमलोग जालिम
के भांति इनके साथ दुर्व्यवार किये!

अब अपना भीषण प्रकोप दिखा
रहा है ई प्रकृति हमसब पर!

प्रकति की इस विकराल रूप
धरने पर हम सब का भागीदार हैं!

केरल का हाल देख कर अभी भी
हमसब को संभलने का वक्त है!

अब बेमौसम बरसात और बेमौसम
बाढ़ और सूखा देखने को मिलता रहेगा!
प्रेम प्रकाश
30/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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