तू नही सकता है हार…

हो नदी की तेज धार
टूट चुकी है पतवार !

यत्न तुम करो प्रबल
तू नही सकता है हार !!

नाव डगमागा रही
और लहर डरा रही !

पर न हौसले को छोड़
और कर दरिया को पार !!

क्या हुआ जो सुख गए
मिल गए जो दुख नए !

पतझड़ों के बाद ही
आती है हरदम बहार !!

शत्रु हो जितना दुर्धर्ष
हो मगर बडा उत्कर्ष !

जो भी भाग्य से मिले
उसको कर लेना सहर्ष !!

आएगी विजय जरूर
थाम खड्ग कर प्रहार !

तू न घबराना कभी
तू न कतराना कभी !

कोई आएगा न साथ
तू अकेला रह तैयार !!

यत्न तुम करो प्रबल
तू नही सकता है हार !!!

मनोज उपाध्याय मतिहीन

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