माँ का प्यार

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माँ का प्यार

By |2018-08-31T20:22:26+00:00August 31st, 2018|Categories: कहानी|0 Comments

माँ का प्यार और अस्तित्व

हम तीन भाई -बहिनों कृतिका यानि मेरा स्थान दूसरे नम्बर पर है,मुझसे बडे़ समीर भय्या और मुझसे छोटी मेरी बहिन कृषा है ।पिताजी का स्नेह पुत्रियों पर अधिक था उधर समीर भय्या माँ के सबसे लाड़ले थे ।

माँ और पिताजी दोनों सरकारी स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त थे।माँ को तो मैने  आरंभ से ही हर किसी कार्य में जल्दबाजी करते हुए देखा शायद यही कारण रहा होगा उनके हृदय और उच्च रक्तचाप की रोगी होने का ।

जब छोटी थी तो माँ के डर से उनके हर आदेश को समय पर पूरा कर दिया करती ,लेकिन जैसे -जैसे बडी हुई उनकी इस जल्दबाजी की आदत से मुझे चिढ़ होने लगी और इसीलिए उनके दिए हर आदेश को टालने लगी,जिसकी वजह से माँ मुझ पर गुस्सा होती और मेरा भी उनसे अक्सर झगड़ा हो जाया करता ।

पिताजी माँ -बेटी की इस नोकझोंक से दूर ही रहते ।कृषा छोटी थी अतः माँ उसे कुछ ना कहती और समीर भय्या तो अपने लड़के होने का पूरा लाभ उठाते ।लम्बी बीमारी के चलते पिताजी का  पचपन वर्ष की आयु में ही निधन हो गया ।उस समय भय्या इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करके नौकरी तलाश रहे थे ।मैं बी.ए फस्ट ईयर में और कृषा नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी ।

आर्थिक रूप से तो नही पंरतु जीवनसाथी के चले जाने पर मानसिक रूप से माँ अवश्य टूट गई।
उनके कंधों पर अब माता और पिता दोनों की जिम्मेदारी आ पडी

माँ हमेशा हमें अपने पैरों पर खडे़ होने का पाठ पढाती रही ।उस वक्त तो मुझे उनकी यह सीख समझ नही आई लेकिन आज जब मै खुद एक माँ हूँ ,उनके इस पाठ का गहराई से अर्थ समझ चुकी हूँ ।माँ के लिए अब हम तीनों ही उसका संसार थे ।
पिताजी के चले जाने के बाद रिश्तेदारों के नाम पर केवल शोक प्रकट किया गया,उसके बाद किसी ने भी मुड़कर ना देखा ।

समय गुजरने के साथ माँ ने हम तीनों को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया और हमारे विवाह की जिम्मेदारी को अकेले ही बखूबी निभाया ।

माँ के इस संघर्ष काल के दौरान मै उनके करीब आ गई इसका मुझे पता भी ना चला ।विवाह के बाद तो माँ मेरी अत्यंत निकटतम सहेली बन गई।समीर भय्या से उन्हे बहुत लगाव और उम्मीदें थी लेकिन उनके विवाह के बाद वे सभी ढह गई ।भय्या का स्वभाव माँ के प्रति उपेक्षा पूर्ण हो गया ।भय्या और भाभी दोनों नौकरी पेशा थे शायद यही एक कारण रहा होगा इसका ।

रिटायर होने के बाद माँ स्वयं को और अधिक अकेला महसूस करने लगी थी इसीलिए मै दिन में  एकबार अवश्य ही उनसे फोन पर बात कर लिया करती ।लोग सही कहते है—जीवनसाथी की असली आवश्यकता तो इन्हीं बुढ़ापे के क्षणों में होती है ,जब अपनी संतान के पास दो घडी बात करने का भी समय नही होता ।

माँ की सेहत उनके उच्च रक्तचाप और हृदय के कारण काफी गिर गई ।पैरों में कमजोरी के कारण चलने में तकलीफ़ होने लगी ।यह देखते हुए मैने उनके लिए एक छडी खरीद ली ।अक्सर जब मै माँ के घर जाया करती तो वे उसी छडी के सहारे बालकनी में टहलती नज़र आया

करती ।मुझे अपने करीब देखकर वे बहुत खुश होती और अनेक पुराने किस्से बार -बार सुनाती ।मै भी माँ के हर सुने किस्से को नए क़िस्से की तरह चाव से सुनती ।

वे मेरी लायी छडी को बडा सहेज कर रखती जब बहुत जरूरत होती तभी इस्तेमाल करती ।मैने उन्हे कितनी बार समझाया कि इसे हमेशा अपने साथ रखो तो कहती अगर टूट गई तो—-मै हसंती और कहती दूसरी ला दूँगी।

समय के साथ माँ -बाप के गुण कब बच्चों में समाहित हो जाते है पता ही नही चलता ।मुझे आभास होने लगा कि माँ का हर कार्य मे जल्दबाजी करने का गुण धीरे -धीरे मेरे अंदर भी प्रवेश करने लगा है लेकिन इसके साथ उनकी इस आदत के पीछे बच्चों में जो अनुशासन लाने का भाव छिपा था अब वो स्पष्ट होने लगा ।

एक दिन अचानक दो बजे रात मेरे मोबाइल की घंटी बजने लगी ।उसकी असमय की ध्वनि से मेरा दिमाग झन्ना सा गया अंदर ही अंदर कुछ टूटता हुआ सा महसूस हुआ बिना कुछ सुने ही आँखें नम सी हो गई और अनायास ही मुंह से निकल पडा़ शायद माँ गई ।मेरे पति ने फोन उठाया ,फोन समीर भय्या का ही था और खबर भी माँ की ही थी जिनका हृदय गति रूकने से निधन हो चुका था ।

माँ के दाह संस्कार के बाद मै और कृषा  आलमारी से उनका सामान दान करने के लिए निकाल ही रहे थे तभी मेरी नजर पलंग के कोने में पडीं उनकी छडी पर गई ।उसे स्पर्श करते ही माँ के साथ बिताए हर क्षण चलचित्र की भाति आँखों के समक्ष घूमने लगे और भावुक होकर मेरे अश्रु निकल पडे ।

माँ की वो छडी निशानी के तौर पर मै अपने साथ ले आई हूँ ।जब भी अकेली होती हूँ उसे स्पर्श कर माँ के प्यार और अस्तित्व को महसूस करती हूँ।

सोनिया थपलियाल

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