भागम भाग ज़िन्दगी

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भागम भाग ज़िन्दगी

भागम भाग ज़िन्दगी

इस भागम भाग ज़िन्दगी
में सहारा कोन देना ये
मुसाफ़िर हम तो हरे पंछी
आज इस डाल पे कल
उस डाल पे कभी कही
बसेरा कभी कही बसेरा
मगर मेरा भी अपना जमीन है
मैं भी उस जमीन से जुड़ना
चाहता हूँ मैं भी अपने मातृ
भूमि से मिलने को बेताब हूँ
पेट के ख़ातिर दर ब दर
भटकते रहता हूँ! मुझे पूर्ण
विश्वाश है मैं भी एक दिन
मिलूँगा अपनो से जो सिर्फ
रिश्तों के ख़ातिर जीते है
मरते हैं! कभी कभी डर भी
लगता है इस मतलबी दुनियां
में क्या मिलेंगे ऐसे अपने
रिश्तेदार! खुद से ज्यादा सवाल
करता हूँ क्योंकि अपना मन
या दिल किसी के कहें उससे
अच्छा है कि खुद से खुद बातें
कर लो ताकि कोई भविष्य में
खुद को किसी और से बातें
जाने पर बहुत तकलीफ़ होता है
ए मन, ए दिल। ज़िंदगी भगम
भाग बना हुआ है पेट के ख़ातिर
दर बदर भटकते रहता हूँ ए मन, ए दिल!
प्रेम प्रकाश
31/08/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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