आजकल के गाँव पहले जैसे नहीं रहे हैं। उनमें भी शहरीकरण जैसा परिवर्तन हो रहा है। भारत के ज़्यादातर गाँवों में बिजली,पानी,इंटरनेट आदि सभी सुविधाएँ पहुँच गई हैं क्योंकि शिक्षा का स्तर निरंतर बढ़ता जा रहा है।
परन्तु फिर भी किसानों की युवापीढ़ी वहाँ रहना पसंद नहीं करती है शहरों में आकर भले ही उनको मज़दूरी क्यों ना करनी पड़े।
गाँव का साधारण सा जीवन , वो मिलनसार लोग, मिट्टी और गोबर से लिपा आँगन की शोंधीं-शोंधी ख़ुशबू …अहा ! देखते ही बनती है। यूँ शुद्ध हवा में साँस लेना और ट्यूबवेल के पानी में नहाना, गन्ने और आम के बाग़ों में विचरण करना, चिड़ियों, तोतों का फलों पर बैठना , वो चूल्हे की रोटी आदि सब मन को बहुत भाता है ।
रात में आँगन में चारपाई बिछाकर तारों से बातचीत और चंद्रमा का एकटक अपनी ओर देखना ! सुबह तड़के चिड़ियों का चहचहाना , गायों का यूँ रंभाना …… पर अब गाँवों में वो बात शायद नहीं रह गई है ! अब सब शहरीकरण में बदलता जा रहा है ।
ऐसा होना सही भी है एक तरह से तभी तो गाँव के बच्चे वहाँ ठहरेंगें और अपने परिवार के साथ आनंद उठायेंगे । भारत के गाँव में उसकी आत्मा बसती है। आत्मा के साथ ही जीवन है अगर वह दुखी तो सब दुखी ऐसा मेरा मानना है ।

मौलिक रचना
नूतन गर्ग ( दिल्ली )

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