तेरे बगैर

Home » तेरे बगैर

तेरे बगैर

By |2018-09-03T07:40:34+00:00September 2nd, 2018|Categories: दोहे/मुक्तक/शायरी|Tags: , , |0 Comments

तेरे बगैर
मेरा दिल तुमपे आया, माना खता हमसे हुई
जो तेरा दिल भी धड़का पलभर को मेरे लिए
के मुकम्मल हो गई मोहब्बत दो दिलों की
अब खता कैसी के मोहब्बत किसको हुई।।

मेरा दिल, मेरी धड़कन भी अमानत तेरी हुई
अब इनको सम्हालो या यूँ छोडो वीरानें में
तेरे सिवा न कोई दवा दिल को धड़काने की
फर्क नही दवा कैसी है जो ज़िन्दगी हुई।।

तुझे दिल में बसाया है एक हस्ती को मिटाकर
तुझे हरपल अपनाया जिंदगी में कस्ती बनाकर
दुनिया लाख आ जाये अब खिलाफ हमारे
कोई फर्क नहीं पड़ता जो तुम साथ हो मेरे।।

मैं दुनिया से भी लड़के जीत सकता हूँ
तेरे लिए तो मैं खुद को भूल सकता हूँ
जो साथ है तेरा मेरी आखिरी सांसों तक
फर्क नहीं पड़ता के दुनिया क्या सोंचेगी।।

जो तू संग है मेरे हर पल को एक नई रंगत सी है
तेरा साथ होने का हर अहसास एक जन्नत सा है
तू है तो सब अपना है वर्ना तो सब सपना है
तेरे बगैर अपना कौन बेगाना क्या फर्क पड़ता है।।

चाहे लाख खुशियाँ मिलें जो मुझे ज़माने की
न मरहम बन पाएंगे ये अहसास के घावों की
जो जिंदगी ही न हो खुद की ही जिंदगानी में
पल भर जियूँ या मर जाऊँ क्या फर्क पड़ता है।।

सफर में दूर निकल आया हूँ, न कोई चाह अब तेरे बगैर
साथ दो तो मुकम्मल हो जाऊँ, हूँ मैं अधूरा अब तेरे बगैर
है जरूरी के मिलें हम, ख्वाब भी हैं अधूरे अब तेरे बगैर
इल्तजा बस इतनी के न हो पल भर की ज़िन्दगी, अब एक दूजे के बगैर।।

सुबोध उर्फ़ सुभाष
31.8.2018

 

Say something
Rating: 2.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment