हलचल मची थी मेघो मे
आसमान भी बिजली से थर्राया था,
टुट गयी थी हथकडीयां सारी
हर द्वार उसने खुला पाया था,
राधा कह रही सखियन ये
जब मेरा कान्हा आया था,

बह रही थी हवा द्वन्द सी
पक्षियो का भी विचित्र शोर था,
छुने मेरे कान्हा के चरणों को
यमुना के जल मे भी बडा जोश था,

अर्द्धरात्री का था वह पहर
वृन्दावन मे नही कोई शोर था,
आ गया पास चुपचाप यशोदा माँ के
वो मुरली मनोहर चित-चोर था,

बरसे थे मेघ घुमड-घुमड के
शेषनाग उसके सर पर ठहर आया था,
झुम-झुम नाचे मयुर सारे
और सबने पंखों टको फैलाया था,

उस पहर अर्द्धरात्री को भी जिसने
भोर का आभास कराया था,
राधा कह रही सखियन से
जब मेरा कान्हा आया था…

#दीपक_युडी

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