सोचते-सोचते लिखना

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सोचते-सोचते लिखना

By |2018-09-04T10:56:50+00:00September 4th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सुबह से सोचते-सोचते
दोपहर हो गया शब्द
कहा बसे ढूंढे मिल नही
पाया की दो शब्द लिखें

कैसे-कैसे लिखे समझ
से परे हो गया मैं लिखू
हिंदी के शब्द एक से बढ़
एक है जो लिखने में शब्द नही!

आदत जो बन गया कि मैं
हर रोज एक कविता लेखन
करने की आदि बन बैठा हूँ
कोशिश जारी रखूंगा ए कारवां!

शब्द को शब्द बनाने में वक्त
लगता है मुझे उमीद है मैं
एक दिन शब्दों के व्यापक
में से शब्द सिख जाउगा एक
दिन मुझे पूर्ण विश्वाश है!

शब्दों का जाल मैं शब्दों की
जाल से खेलना सिख जाऊँगा एक दिन!
– प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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