हे स्वप्न तुम्ही मेरे संसार
जीवन के अनुपम उपहार

होता प्रतिपल आकुल अन्तर
जीवन तो है सत्य भयंकर
प्राणों की आहूति दे देकर
चाहूं देखूं तुम्हे निरन्तर

देख लिया अब सत्य जगत का
ले चल अब बादल के पार

हे स्वप्न विश्व के प्रथम चरण
मैं दे डाला हूँ निशा निमंत्रण
अमा निशा सा लगता जीवन
कालरात्रि सा बीता प्रति क्षण

सहज शांति भी भंग हो गई
हृदय में केवल हाहाकार

सारे रिश्ते हुये कलंकित
मन है हर घटना पर शंकित
रंग बदलते रिश्ते नाते
हो न क्यू फ़िर हृदय अचंभित

पीड़ा पीड़ा केवल केवल पीड़ा
हो कैसे सुख का सत्कार

– उपेंन्द्र द्विवेदी

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