यश और आलोचना

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यश और आलोचना

By |2018-09-03T22:13:21+00:00September 3rd, 2018|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

(यश और आलोचना……सिक्के के दो पहलू)

यश और आलोचना सफलता के शिखर पर पहुँचाने वाली सीढ़ी पर लगें दो विपरीत दिशाओं के वह खम्भे है जो किसी व्यक्ति को आगे बढा़ने में सहायक होते हैं ।यद्यपि यश और आलोचना स्वभाव और प्रवृत्ति में एक दूसरें से विपरीत होते हुए भी एक दूसरें के पूरक होते हैं ।जहाँ यश का पदार्पण हुआ वहाँ अालोचना का आना स्वाभाविक है ।

जहाँ यश मनुष्य को उंचाई के शिखर पर स्थापित करता है,वहीं आलोचना उसमें उंचाई को प्राप्त करने से उत्पन्न होने वाले अंहकार या दंभ का संहार करते हुए उसे उसकी मौलिक विशेषताओं से जोड़े रखती हैं ।

वास्तव में यदि यश एक पहले से गडी कोई आकृति है तो आलोचना वह औजार है जो आपके अंदर छिपी कला को तराशने का कार्य करती है ।प्रारंभ में बेशक औजार का प्रहार अच्छा प्रतीत नही होता परंतु जब वह अपने निरंतर प्रहार से किसी वस्तु को अद्भुत आकार प्रदान करती है तो वह आकर्षक और सुन्दर दिखाई पड़ता है ।

देखा जाए तो आलोचकों की भी दो श्रेणियाँ हैं ,प्रथम वें जो वास्तव में अपनी बुद्धि की दक्षता से किसी व्यक्ति या वस्तु की आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करते हैं ।वे उच्च श्रेणी के आलोचकों में गिनें जा सकतें है और जिनकी सामान्यतः संख्या भी कम है ।दूसरे वे आलोचक हैं जो बुद्धि की दक्षता का प्रयोग ना करते हुए मात्र ईर्ष्या अथवा जलन के प्रभाव में आकर आलोचनात्मक समीक्षा देतें हैं ।

खैर जो भी हो दोनों ही श्रेणी के आलोचकों के योगदान को कदापि नकारा नही जा सकता ।दोनों ही व्यक्ति में छिपी प्रतिभा के निखारने में सहायक रहते हैं ।

अंत मे इतना ही कहना उचित होगा कि यश और आलोचना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं यदि हमें कभी ना समाप्त होने वाली वास्तविक प्रसिद्धि को प्राप्त करना है तो यश की भांति आलोचना को भी सहर्ष स्वीकार कर उसका अभिनंदन करना होगा ।

सोनिया थपलियाल

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