पेरेंट्स, बच्चों को ना पकड़ाएं मोबाइल का झुनझुना

पेरेंट्स, बच्चों को ना पकड़ाएं मोबाइल का झुनझुना

पैरेंट्स, अपने बच्चों के हाथ में मोबाइल का झुनझुना देना बंद करिए _____

डिजिटल लत का चस्का__संचार क्रांति ने हमारी दुनिया बदल कर रख दी है। मोबाइल जीवन की जरूरत बन चुका है। जहां एक और यह आवश्यक है वहीं इसके अत्यधिक प्रयोग से नुकसान,परेशानियां भी पैदा हो रही हैं। बच्चे का प्रथम स्कूल घर ही है, वे माता-पिता का ही सबसे ज्यादा अनुसरण करते हैं। अतः माता-पिता भी इनका सीमित प्रयोग कर बच्चों के साथ समय व्यतीत करें। घूमने जाएं, घर के कार्यों में सहायता लें, शारीरिक खेल या दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। इस तरह हम छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर बच्चों को इसका आदी होने से बचा सकते हैं।

एक शोध के मुताबिक, स्मार्टफोन दुखी एवं परेशान रहने वालों की पूरी पीढ़ी तैयार कर रहा है। जो बच्चे स्क्रीन, मोबाइल गेम, कंप्यूटर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं, वह ज्यादा दुखी परेशान रहते हैं। बच्चे यदि व्यायाम करने एवं दोस्तों से प्रत्यक्ष बातचीत में ज्यादा समय देंगे, तो वे ज्यादा खुश रहेंगे। मीडिया पर ज्यादा समय देने से अवसाद, नाखुशी बढ़ती है। शोध के मुताबिक लंबे समय तक लगातार मोबाइल प्रयोग करने से रेडिएशन से शरीर का पानी सूखने लगता है। लंबे समय तक मोबाइल प्रयोग करने से गर्म हो जाता है, यह भी सेहत के लिए अहितकर है। इसके बेतहाशा उपयोग से विद्युत चुंबकीय क्षेत्र फ्री रेडिकल्स की संख्या में इजाफा कर देता है, जिससे बायोलोजिकल सिस्टम के बिगड़ने की संभावना रहती है। मोबाइल फोन से आंखों, सुनने की क्षमता, पाचन संस्थान एवं पॉश्चर पर भी इसका बुरा प्रभाव दिख रहा है। बेहतर होगा स्मार्टफोन स्क्रीन पर कम समय बिताएं।

भटकाव बढ़ाता मोबाइल, आपका दोस्त कम दुश्मन ज्यादा है। कई बार इसके अत्यधिक प्रयोग की वजह से घरों में कलह होती देखी गई है। हम एक दूसरे पर कम ध्यान दे रहे हैं।पूरी दुनिया की खबर रखने की कोशिश में अपनों के प्रति लापरवाह हो रहे हैं।

आजकल अक्सर देखने में आता है, नये बने माता पिता अपने छोटे छोटे बच्चों को बहलाने, खाना खिलाने, सुलाने या रोते हुए को चुप कराने के लिए भी मोबाइल पकड़ा, यू ट्यूब दिखा कर खुश होते हैं। शुरू में आपने बच्चे को पकड़ाया, परिचित करवाया, बाद में,ये ही लाड़ मुसीबत बन, परेशान करेगा। वो बच्चा अपनी आदत एकदम कैसे छोड़ देगा। कई बार माता-पिता को पता ही नहीं होता, कि बच्चे सोशल मीडिया पर क्या कर रहे हैं????? देर रात तक ऑनलाइन रहते हैं, बच्चे ज्यादा स्मार्ट होते हैं, वे मैसेज आदि डिलीट कर, अपने आप को भोला, मासूम, पाक साफ दिखाते हैं, और माता-पिता उन पर तुरंत यकीन कर लेते हैं। मेरी अपनी सोच है, जब तक बच्चे समझदार ना हो जाएं,उन्हें कमरे में अकेले नहीं सोने देना चाहिए। वो रात में क्या कर रहा है, आपको पता ही नहीं होता, देर रात ऑनलाइन रहता है। ये जो आजकल विदेशी संस्कृति हावी हो रही है, बच्चे अलग सुलाने की। पहले के समय में बच्चे सब एक साथ, या दादी, नानी के साथ सोते थे। इस तरह कुछ भी गलत करने की संभावना कम ही होती थी। आजकल बच्चे रात में क्या कर रहे हैं, पैरेंट्स को ही पता नहीं होता।

इंटरनेट के मायाजाल से अपने बच्चों को निकालिए। लती (एडिक्ट) तो आप भी कम नहीं। बच्चों को आपका बहुमूल्य समय चाहिए, और वो आप देने की बजाय, मोबाइल देकर पीछा छुड़ाते हैं। बच्चे भी पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक सभी कुछ इसी पर करना चाहते हैं। छोटी उम्र में इन डिवाइस के इस्तेमाल से बच्चों में मतिभ्रम की स्थिति बन जाती है, क्या करूं, क्या ना करूं।

एक शोध में पाया गया कि जो बच्चे,किशोर, युवा मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उन बच्चों की स्मरण शक्ति, एकाग्रता अत्यधिक कमजोर हो जाती है। साथ ही चिड़चिड़े तथा आक्रामक स्वभाव के हो जाते हैं। मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन युवाओं के सिर को 25% 10 से 15 साल के बच्चों के सिर को 50% तथा 10 वर्ष से छोटे बच्चों के सिर को 75% तक प्रभावित करता है। ब्रेन कैंसर का खतरा कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है। युवाओं में स्पर्म में 30% कमी आ सकती है, नई कोशिकाएं बननी बंद हो सकती है। अल्जाइमर, अनिद्रा, सिरदर्द, leukemia जैसी बीमारियों के होने की संभावना रहती है।

बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह ना मोड़ें। अपनी इस जिम्मेदारी को समझें, बच्चों को पूरा समय दें, अन्यथा दुष्परिणाम का सामना आपको भी करना होगा। छोटी उम्र में मोबाइल देने से इंटरनेट के माया जाल में फंसकर गलत दिशा में जाने की संभावना रहती है। अगर पढ़ाई के लिए जरूरी लगे तो भी अकेले में कमरे में मोबाइल पर काम ना करने दें, कंप्यूटर पर करें, जिससे उन पर नजर रखी जा सके। बच्चों को हमेशा लिखकर बोलकर पढ़ने के लिए प्रेरित करें। इस तरह उसे याद भी अच्छा होगा, एकाग्रता बढ़ेगी। कभी भी मोबाइल या कंप्यूटर पर लिखने को ना कहें, और इसे आप चेक भी करते रहें। अगर ऐसा नहीं किया तो, इसके अत्यधिक उपयोग या कहें दुरुपयोग, लत के भयंकर परिणाम देर-सवेर बच्चे और उनके अभिभावकों को भुगतने के लिए तैयार होना पड़ेगा।

अभी भी देरी नहीं हुई है जब जागो तब सवेरा, यही वक्त है बच्चों को संभालने का। आज के बच्चे उस दुनिया में जी रहे हैं, जहां आप नहीं है, और बच्चे आप को कैसे??? दूर रखा जाए जानते हैं। इसलिए बच्चों के साथ समय बिताएं। अगर आप बच्चों पर ध्यान देते हैं, मोबाइल इंटरनेट से दूरी व प्रकृति हरियाली के साथ रहना, परिवार के साथ घूमना, घर के सदस्यों को कम चिड़चिड़ा बनाने में सहायक है। इस तरह बच्चा, मानसिक संतुलन को मजबूत बनाए रखने में, स्वनियंत्रण व दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार करता है। अगर आप परिवार के साथ समय बिताते हैं, तो आप व बच्चे शांत रहते हैं। इस तरह हम छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर बच्चों को इसका आदी होने से बचा सकते हैं। यह आपका ही नहीं, देश के स्वर्णिम भविष्य का सवाल है।

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