आँखो को क्या जो दिखता है उस पर वही अमल करती है
और काल गति से प्रेरित हो उस पर वही पहल करती है!

पर जो अंतरनयन है वो सच झूठ सभी बतला देती
कभी विराने को घर बोली खंडहर कभी महल कहती है!!

हंसते चेहरे के पीछे क्या दर्द छुपा जाना किसने
मन की पीड़ा को अब तक बिन कहे है पहचाना किसने!

पर जिसने अंदर से देखा उसको हाल पता कहती है !
पिये उम्र भर आंसू इसने बिन बोले सब कुछ सहती है!!

पीर पराई किसने जाना किसने उसका मोल दिया
जख्म कहां किसका कितना इसने ही सहज से तोल दिया!!

भेद कहे ना कहे कोई हर राज सभी का ये जाने
दुनियां की हर सच्चाई के साथ सदा आँखें रहती है!!

– मनोज उपाध्याय मतिहीन

Say something
No votes yet.
Please wait...