ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है,
आदमी आदमी पे कर रहा अत्याचार है|
कहीं लुट रही अस्मत अबला की तो कहीं सामूहिक बलात्कार है|

ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है|
खेल रहे हैं दैत्य जिंदगी से, 
कामुकता और दरिंदगी से|
हो रहा स्त्री के आत्मसम्मान पे वार है|

ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है|
नष्ट कर देते हैं ये दुष्ट जीवन को, 
मिटाने अपने क्षणिक हवसपन को|
मर्यादा इज्जत हो रही तार तार है|

ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है|
गली मोहल्ले और सड़कें अब नहीं रही सुरक्षित हैं, 
नारी इनके लिए बस भोग वासना से सुसज्जित है|
क्या मानवता का ये ही सुविचार है|

ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है|
नारी चल अब बहुत हो चुका तुझको ही उठना होगा, 
लेके रूप तुझे कृष्ण का इन कंसो का वध करना होगा|
दिखा दे इन असुरों और दानवों को, भेष बदले इन बहरूपी मानवों को|
सर कुचल दे तू इनका क्योंकि तू ही दुर्गा, तू ही काली, तू नहीं लाचार है|
ये कैसी वेदना ये कैसी चीत्कार है|

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