झूठ,दिखावा और फरेब

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झूठ,दिखावा और फरेब

By |2018-09-07T14:56:08+00:00September 7th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सच्चे कभऊ ना बन सके जा के मन मैं खोट,
बात बात में काँप रहे देखो उनके होंठ|
देखो उनके होंठ शरम हया कहूँ बेच आये,
छोटी छोटिन बात पै झूठी कसमैं खाये|
तन कै एैसै चलत हैं जैसै राजा हरिशचंद,
मूरख बन कै जी रहे बनते भलै अकलमंद|
बनते भलै अकलमंद एक दिना पछताओगे,
छोर देंगे साथ सभी फिर कछु न कर पाओगे|
बात मानोगे हमारी तौ बने रहोगे अच्छे,
झूठ,दिखावा छोड़ दो बन जाओ तुम सच्चे|

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