कई प्रश्नचिन्ह बाकी हैं ???

कई प्रश्न चिह्न बाकी हैं????
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 5 साल पुराने फैसले को रद्द कर, 158 साल से लागू पुराने कानून को पलटकर, समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है। इसके अनुसार आपसी सहमति से दो सम वयस्क लोगों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को, अब अपराध नहीं माना जाएगा। करीब 55 मिनट में सुनाए, इस फैसले में धारा 377 को रद्द कर दिया गया है। अब स्त्री और पुरुष के बीच अप्राकृतिक संबंध को भी अपराध नहीं माना जाएगा।

कई युवा और उनके माता-पिता भी, एल जी बी टी समुदाय को मान्यता देने पर खुशी मना रहे हैं। विकृत मानसिकता पर न्याय प्रणाली की मोहर लगना, मतलब स्वीकृति। कल को पेट भरने के लिए नौकरी करने की बजाय, चोरी, लूटपाट जैसे अपराधों को भी, अगर न्यायपालिका पालिका उचित ठहरा कर दे, तो यह भी ठीक ही मानी जाएगी। कहां तक उचित होगा???

अभी कोर्ट से फैसला आया ही है, और सब जगह चर्चाएं शुरु हो गई, गॉसिप का एक मुद्दा मिल गया अब शादी के कार्ड इस तरह छपा करेंगे, राहुल संग रोहित, या प्रीति संग नेहा। समझ से परे है, ऐसी तुगलकी न्याय प्रणाली। पर अब तो इसको लीगल मोहर लग गई है।

निजता के साथ मर्यादा का भी ध्यान रखना चाहिए।सब जानते हैं, हमाम में सब नंगे हैं, तो क्या इसका मतलब आप सड़क पर भी नंगे होकर नहाएंगे? इस नंगेपन को कानूनी जामा पहनाना, शायद यही कलयुग है। यह कौन सी संस्कृति है?? और कितना गिरेंगे?? गलत काम को सही करने के लिए क्या एक जज के सनकी फरमान (जजमेंट) काफी है। चन्द उच्छृंखल लोगों की मनमानी के कारण, अप्राकृतिक संबंध को अपराध नहीं माना जाएगा। क्या यह सब चीजें देश और समाज हित में हैं??? मौलिक अधिकार की रक्षा की बात सही है, जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भी होना चाहिए, लेकिन क्या ऐसे पाशविक विचारों की भी सुरक्षा होनी चाहिए। क्या इससे भारत में पुरुष वेश्यावृत्ति या यौन गतिविधियों में लिप्त, अपराधों के ग्राफ में इजाफा नहीं होगा?????? चरित्रहीनता का बीज कानून के अंतर्गत पास हो गया। बेहद शर्मनाक!!!! हर व्यक्ति की अपनी अलग सोच हो सकती है, सभी स्वतंत्र जीना चाहते हैं, पर क्या मनमानी से जीना और पतित हो जाना सही होगा। अमर्यादित यौन आचरण हर युग में रहा है, लेकिन वह मूलतः धन, बल से शक्तिसंपन्न समाज से ही जुड़ा दिखाई देता है। प्रकृति ने इस दृष्टि से सभी प्राणियों को मर्यादा में बांधकर रखा है। हम किसी भी प्राणी को देखेंगे तो वह उस प्रकृति से बाहर यौनाचार करता दिखाई नहीं देता। जंगल में रहने वाले स्वच्छंद जानवर भी प्राकृतिक क्रम में और संतान उत्पत्ति के लिए ही यौनक्रिया करते हैं। केवल मनुष्य ही अमर्यादित कार्यों की ओर प्रेरित होता है। आजकल पाश्चात्य देशों के प्रभाव से, मनुष्य कुंठाओं में जी रहा है, मादक द्रव्यों का सेवन और वासनाओं में लिप्तता को ही अपनी स्वतंत्रता मान बैठा है। मनुष्य स्वतंत्र होने के बजाय, स्वच्छंदता की ओर अग्रसर हो रहा है। परिवार नाम की संस्था पर इस तरह घोर संकट पैदा हो जाएगा। ये फैसला एक तरह से वैचारिक, नैतिक विघटन की यह पराकाष्ठा है। स्वतंत्रता सबको अच्छी लगती है, लेकिन जो समाज, परिवार को विघटन की स्थिति तक ले जाए या जिसका अंत दुखदाई हो वह सही नहीं है। स्वतंत्रता के साथ सामाजिक व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी की कानून की व्यवस्था।

धारा 377 के अंतर्गत मर्द मर्द से या औरत औरत से शादी कर सकते हैं। अब सवाल यह भी उठता है, क्या सामाजिक ढांचा गड़बड़ाएगा नहीं, पारिवारिक संस्था क्या मायने रखेगी?? इस की क्या व्यवस्था होगी?? इसमें बारात आएगी या जाएगी। पति कौन होगा पत्नी कौन होगी अदालत यह भी तो समझाए। गे में क्या केवल पति पति ही होंगे या लेस्बीयन में पत्नी पत्नी, और अगर पति-पत्नी ही कहलाना है, तो फिर समलैंगिक क्यों होना, शादी से एतराज क्यों???

समाज को हम किस दिशा में ले जा रहे हैं। और फिर बच्चे कैसे होंगे उनकी प्लानिंग कैसे होगी। अगर ये बच्चों को गोद लेते हैं, तो उनकी परवरिश के लिए उचित माहौल दे पाएंगे??? अभी तक तो (दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे) फिर आया (एक या दो बच्चों का कानून), अब उससे भी मुक्ति, हो सकता है बच्चों के लिए तरस ही जाएं। इसके बारे में कुछ नहीं बताया, बच्चे क्या किसी पौधशाला, नर्सरी में उगाए जाएंगे, या प्रयोगशाला में बनाए जाएंगे??? संस्कृति की नहीं तो अपने वोटों की ही सोच लीजिए, राजनीति में इतना भी नहीं गिरना चाहिए, नस्ल ही खत्म कर दोगे, तो राज किस पर करोगे, किस के वोटों से जीत होगी, जाने और क्या होगा।🤐 आखिर कब तक मौन रहेंगे।

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