जब जब हवाएं

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जब जब हवाएं

By |2018-09-10T11:57:12+00:00September 10th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

जब जब चले हवाएं
सन-सन मन को लचाएं
दिल को रास आये ये
पवन पुरवाई जब जब बहें!!

उनकी जुल्फ़ें कुछ इस क़दर
हवाएं उड़ाएं जैसे नागिन लहारें
इस क़दर लहराएं जैसे मानों
पेड़ की घटाएं छाएं मानों!!

उनकी आकृति मेरे जेहन में
कुछ ऐसा मन में समाएं है
जैसे मन मे कोई कौतूहल हो
जैसे मन की छवि को झरोखें!!

उनकी सुहनरे केश को देखकर
ऐसा लगता है जैसे रेशमी जुल्फ़ें
पेड़ की पति की छाया हो मानों
कभी छायाप्रति प्रतीत होती है

उनकी निगाहें इस क़दर नशीले
आँखें की नशीली आँखों का नर्मी जैसे कोई मानों शराबी की नयनों
की भांति लाल नसिले नयन हो!!

उनकी चेहरे की लाली देखकर
लाली जैसे सूर्य की लालिमा
देख कर ऐसा प्रतीत होता है
जैसे सोने की पानी हो जैसे!!

उनके होंठ मानों गुलाब की
फखुड़ी हो जैसे कोमल-कोमल
हल्की-हल्की सी गुलाबी रस भरा
मधुशाला हो मानों उनके होंठ!!

उनके इस आकृति मानों लगता है
की उर्वशी और मेनिका जैसे प्रतीत होती है
ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि मानों छवि हो जैसे की!!

मानो ऐसा लागत है कि कोई परी
धरती पर जमीन उत्तर आई हो जैसे
मानों की परियों का मेला लगा हो
जैसे की जन्नत की जमीन!!

– प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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