शर्मो -हया को रुसवा किया (ग़ज़ल)

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शर्मो -हया को रुसवा किया (ग़ज़ल)

शर्मो-हया को रुसवा किया,
अरे इंसान तूने ये क्या किया?

ना नज़रों में, ना तहज़ीब में शर्म,
तेरी आधुनिकता ने इसे डस लिया.

आदमी की क्या बात करें यहाँ तो,
औरतों ने भी यह गहना त्याग दिया.

भिखारी का फटेहाल होना है मज़बूरी,
और अमीरजादों का यह फैशन हो गया.

कपड़े जिस्म और रूह का पर्दा होते हैं,
फिर क्यों तू नंगेपन पर उतर आया?

ना समाज की परवाह, ना बड़े-बुजुर्गों की,
यह नया खून इस कदर बेशर्म हो गया.

खूबसूरती तन /मन की पोशीदा होने में है,
जो बेपर्दा रहोगे; पशु और तुममें फर्क क्या?

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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