गजल

न जाने क्या हुआ है शहर सहरा हो गया अब तो
कि प्यासे पी गए सागर भी कतरा हो गया अब तो!

सुना था कान होते है दीवारों के भी दुनियां में
मगर देखो जरा आदम भी बहरा हो गया अब तो!!

जो नावाजिब था पर पहरा लगाते थे हमी उस पर
मगर वाजिब जो है उस पर भी पहरा हो गया अब तो!

बना इंसा यहां सब कुछ मगर इंसा न बन पाया
यहां पर आदमी मे भेद गहरा हो गया अब तो!!

बरसता है कही बादल कही सुखा ही रहता है
सियासत आ गई जाहिल ये बदरा हो गया अब तो!

हंसी के नाम पर अब कहकहे करती है ये दुनियां
बहुत मायूस शहनाई की लहरा हो गई अब तो!!

– मनोज उपाध्याय मतिहीन

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