शिखा का पूरा शरीर एकदम पीला पड़ चुका था। उसमें इतनी भी ताकत ना थी कि वह स्वयं खडी़ होकर दो कदम भी चल पाए। वह अभी दस वर्ष की ही थी। डॉक्टर उसे पुनः रक्त चढानें का कह चुके थे। जन्म के साथ ही उसे अनेक बार रक्त चढाया जा चुका था। कुछ आठ-नौ महीने ठीक-ठाक रहने के बाद उसमें पुनः रक्त की कमी हो जाती। शिखा मेजर थैलेसीमिया की शिकार थी, जो एक अनुवांशिक रक्त विकार है। वह आम बच्चियों की भांति तो दिखती थी परंतु वह उनकी तरह आम जीवन जीने में सक्षम नही थी। इस रक्त विकार ने उसे हाथ-पैर, कान और आँख होते हुए भी मानसिक और शारिरिक दोनों रूप से अपाहिज कर दिया था। पडो़स की हमउम्र मयूरी को गुडि़यां के साथ खेलता देख उसका मन भी करता कि वह भी अपनी गुड्डा-गुडि़यां का ब्याह रचाए। वह भी पार्क में झूले पर बैठकर क्षण में आकाश की उँचाइयों को छू ले परंतु दुर्भाग्य ऐसा था कि जरा सा भी शारीरिक श्रम उसे निढाल बना सकता था।
उसका जीवन तो दवा की बोतलों में बंद इंजेक्शन और उन रक्त नलियों का जाल बन चुका थ जो उसके वजूद को जिंदा रखने के लिए जरूरी थे। रक्त चढा़ते वक्त वह स्वयं से आती ताज़े रक्त की महक को भी महसूस करने लगी थी। जिससे उसे नफ़रत सी होने लगी थी। शिखा की इस दशा के लिए उसके माता-पिता स्वयं को ही सबसे बडा दोषी मानते थे दरअसल शिखा की तरह मेजर तो नही परंतु उन दोनों को भी माइनर थैलेसीमिया था। शिखा के पिता को तो अपने रक्त के इस अनुवांशिक विकार की जानकारी पहले से ही थी लेकिन उसके पश्चात भी इसका ज़िक्र उन्होंने ना तो शिखा की माँ से किया ना ही शिखा के जन्म से पहले डॉक्टर से, वह जानते थे कि दो माइनर थैलेसीमिया वाले माता-पिता एक मेजर थैलेसीमिया बच्चे को जन्म दे सकते है जिसे जीवन भर गम्भीर रक्त विकार के कारण जीने के लिए सदैव रक्त की आवश्यकता रहती है। शिखा की माँ को शिखा के जन्म के बाद अपने रक्त की इस अवस्था का ज्ञान हुआ जब डॉक्टर ने शिखा को गम्भीर रक्त विकार से पीड़ित बताते हुए रक्त चढाने की बात बताई। दोनों माता-पिता यह पता चलते ही अथाह दुख के सागर में डूब गए।
आज भी हमारे देश में पाँच में से दो लोगों में माइनर थैलेसीमिया अनुवांशिक रक्त विकार पाया जाता है। यह लोग सामान्य जीवन भी व्यतीत कर सकते है इन्हें रक्त की भी आवश्यकता नही होती यह लोग तो बस इस अनुवांशिक रोग के गम्भीर रूप के वाहक होते है जैसे शिखा को अपने माता-पिता से इस रक्त विकार का गम्भीर रूप प्राप्त हुआ।
बाहर के देशों मे लोग इसे लेकर बहुत जागरूक है। वे लोग विवाह से पूर्व अपने रक्त की जांच करवा के उसके हर अनुवांशिक विकार की जानकारी प्राप्त करते है और अपने होने वाले जीवन साथी से भी इसे साझा करते है ताकि आने वाली संतान स्वस्थ और सुन्दर हो।
हमारे समाज में विवाह जन्मकुंडली और गुणों के मिलने के आधार पर ही तय किया जाता है कभी वर या वधू अपने परिवार के किसी अनुवांशिक रोग या कमी का उल्लेख करना उचित नही समझते बेशक बाद में ही क्यों ना कितना ही दुख झेलना पडे अथवा समस्याओं का सामना करना पड़े जिस तरह शिखा के माता-पिता की अनभिज्ञता और लापरवाही उनकी फूल सी बच्ची के लिए अभिशाप के रूप में सामने आई।

– सोनिया थपलियाल

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