ज़रा सोचो समझो विचार करो

ज़रा सोचो समझो विचार करो

ज़रा सोचो समझो विचार करो
अब सभल जाओं ए संसार वाले
प्रकृति को कृतिम मत बनाओ
इस धरती को खो दोगे ए मानव!!

कृतिम से धरती की छाती को
छेद पर छेद किए जा रहे हों
खोद-खोद के खण्डहर बना दिए
जैसे बीहड़ और पहाड़ हो वैसे!!

विलुप्त हुए झरने और तालाब
जंगल के जीव-जंतु हुए बेहाल
जिस धरती की शोभा बढ़ाने
एक एक सजीव है अनमोल रत्न!!

जला दिए तुमनें जंगल और जंगल
की हरियाली अब नही रहा वन!
कभी हुआ करते थे वृक्ष और उपवन
सिर्फ आंगन का बच गया हरियाली!!

तोता, मैना, गोरैया और हारिल
की चहचहाने की खनक कहां
खो गए इनके मधुर स्वर इस जाहांन में!
नदी अब नाले में तब्दील होते चले गए!!

सब कुछ खत्म होते जा रहे हैं
अब बिसरे हुए पल याद आएंगे
उस आंनद के अलावा कुछ याद नही
रोज़-रोज़ नए खोज ने गम्भीर बना दिया!!

तरंगों की वेग से मानसिक बीमारी
और मानव का संतुल समाप्त हो गए
भूल गए सारे मानवता का पाठ
सब कुछ लुटा बैठे है संसार वाले!!

धरती की इस दशा को देख कर
त्राहि त्राहि मन हो गया है मेरा
पवित्र धरती को सब दूषित करते
चले जा रहे हैं अब धर्म-कर्म का नाम नही!!

संसार वाले अभी भी समय शेष बचा है
खुद को इस कृतिम से बचा लो ए मानव
कहें प्रेम प्रकाश इस अन्याय को अब
रोक दो ए प्रघाटी मानव खुद को संभालो!!
– प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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