जीवन की हकीकत

बढ़ती उम्र की अलग ही कहानी है,
ढलती जा रही तेरी जवानी है|
बच्चे अब बड़े से होने लगे हैं,
बाल अब सफ़ेद से होने लगे हैं|
जिम्मेदारियों के बोझ से कंधो को झुकाता गया,
सब कुछ पा लेने की जद्दोजहद मैं खुद को भुलाता गया|
ख्वाइशें हर मोड़ पर बढ़ती ही रहीं,
चिंताएं उसका दम घोटती ही रहीं|
लेकिन अब मेहनत का फल आने लगा है,
बेटा उसका डॉलर में कमाने लगा है|
छोड़ कर माँ बाप को जा बसा परदेश में,
ढाल लिया उसने एक नए परिवेश में|
बूढ़ा बाप फिर भी खुश हो जाया करता है,
जब याद आती है तो फ़ोन मिलाया करता है|

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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