सोच रहा था क्या लिखूं, द्वन्द हो रहा था अंतर्मन में|
कुछ लिखूं फिर मिटा डालूं, हलचल थी मेरे मन में|
कुछ लिखा राजनीति पर, तो कभी शब्दों मैं हास्य बसा था|
कुछ रचनाएँ मॅहगाई की थी, तो किसी कविता मैं प्यार बसा था|
कुछ ऐसे भी लफ्ज़ बहुत थे, जो थोड़ा इतराते थे|
कुछ आ जाते फट से मन में, तो कुछ थोड़ा कतराते थे|
कुछ शब्दों मैं दर्द बहुत था, तो कुछ बैचनी दिखलाते थे|
रचना का सागर बन जाता, जब कागज़ कलम मिल जाते थे|

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