क्या बात है जग में, अरे!भाषा हिंदी की।
नीलगगन में चंदा-सी, है आभा हिंदी की।।

देवनागरी लिपि इसकी, है बनावट में सुंदर।
देती हो शोभा जैसे, ये माथे पर बिंदी की।।

बोलने और लिखने में, सरल बहुत है हिंदी।
है वैज्ञानिक ये तो, एक मिसाल ज़िंदी की।।

संविधान की धारा 343 में, है राजभाषा ये।
बोलते करोड़ों जन, कितनी चाहत हिंदी की।।

टी ओ टू एस ओ सो, बड़ी उलझन अंग्रेज़ी।
जैसा बोलो वैसा लिखो, ये क़रामात हिंदी की।।

किस्से कहानी कविताएँ, हर विधा का सागर।
झरता ज्ञान का झरना, हैं ज़ज्बात हिंदी की।।

सेवक बन हिंदी का रे, प्रचार बढ़ा तू प्रीतम।
हर ज़ुबान हो एकदिन, जय जयकार हिंदी की।।

– राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम” कृत
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