मुझे याद है मै भूला नही मेरे गाँव की वो सर्दियां
वो छाँव पीपल का घना वो धूप की कुछ जर्दियां!

मेरे दिल मे आज भी है बसी गलिंयां हमारे गांव की
मुझे अपने शहर से बेदखल जरूरतों ने कर दिया!!

जो हरा भरा था चमन कभी खिजा में शायद उजड़ गया
ये नसीबों की है दास्तां क्या संवर गया क्या बिगड़ गया!

मेरा हाथ खाली था उस समय पर दिल भरा था प्यार से
अब हाथ टूकड़े कागज मगर वो प्यार जाने किधर गया!!

रुशवाइयों का भी सिलसिला मेरे साथ हमदम सा रहा
कोई बात हमने सुना नही कोई लफ्ज दिल मे उतर गया!

फिर भी न जाने दिल मेरा क्यों याद करता है उसे
जो ख्वाब था बस ख्वाब था आँखे खुली तो बिखर गया!!

– मनोज उपाध्याय मतिहीन

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