हिंदी दिवस पर कुछ शब्द……

बढ़ाएँ अपना एक क़दम हिंदी की ओर…
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की दो पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रभावित करती हैं…
“ निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हित को शूल।।”
अर्थात जिस देश की भाषा प्रगति पर हो वही देश उन्नति करता है ऐसा मेरा मानना है। हिंदी हमारे राष्ट्र को राजभाषा, संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के तौर पर देश को एकता के सूत्र में सहेज सकती है। लेकिन भारत की बदलती फ़िज़ा में जिस तरह से अंग्रेज़ी घुलती जा रही है, उससे हिंदी का महत्व कम होता जा रहा है।
हिंदी महज़ साहित्यकारों और कवियों तक ही सिमट कर रह गई है, कहने को तो यह बहुसंख्यक लोगों की भाषा है। इसके लिये कुछ हद तक हमारी सरकार भी ज़िम्मेदार है क्योंकि आज़ादी के बाद आर्थिक विकास के लिये सबसे ज़रूरी कुछ लगा तो वह थी अंग्रेज़ी भाषा । पहले छठी से अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती थी पर अब कक्षा १ से। आज उसी का दुष्परिणाम है कि किसी भी निजी स्कूल में हिंदी दोराहे पर खड़ी नज़र आ रही है और अंग्रेज़ी मानों संस्कार की भाषा बन गई है। महज कुछ सरकारी स्कूल ही मिलेंगे जहाँ हिंदी की आत्मा अपना अस्तित्व संभाले बैठी है।
अंग्रेज़ी का व्यापक होना इसके पीछे कई कारण हैं – आजकल अंग्रेज़ी बोलने वाले व्यक्ति को आधुनिक और सम्मानित व्यक्ति माना जाता है फिर चाहे उसका धाराप्रवाह इतना स्पष्ट भी न हो । बातचीत के दौरान अगर आप खाने के साथ अचार और सलाद की तरह कुछ प्रभावी शब्दों को अपनी वार्ता में लेते हैं तो सामने वाले पर आपका प्रभाव होना तय है ।
इसलिये हिंदी को प्रभावी बनाने के लिये सरकार को कुछ ठोस क़दम उठाने पड़ेंगें जैसे – हर क्षेत्र में हिंदी अनिवार्य करनी होगी, नौकरी प्रदाता बनाना होगा, राजनीति और बाजारवाद से दूर करना होगा, शासकीय कार्यों में इसे लाना होगा और जन – जन की भाषा बनाना होगा
हम ख़ुद भी इसकी पहल कर सकते हैं जैसे सुबह–सुबह गुड मार्निंग की बजाय प्रात: नमन बोल सकते हैं, हस्ताक्षर हिंदी में करें, बोलने में हिंदी का प्रयोग ज़्यादा करें, अपना सब काम हिंदी में करें चाहे फिर हमें कितना भी अपमान सहना पड़े, बच्चों को भी इसका ज्ञान दें उन्हें उत्साहित करें।
अगर हम ख़ुद से शपथ लें कि चाहे कुछ भी हो जाये हम हिंदी में ही सब कुछ करेंगें तो वह दिन दूर नहीं जब इसकी पहचान फिर से अपने शिखर पर पहुँच जायेगी। वैसे आजकल शोशल मीडिया पर इसका चलन दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है । फ़िल्में भी हिंदी की बाहर के देशों में पसन्द की जाती हैं। जन – जन की भाषा बनती जा रही है हिंदी ।

मौलिक रचना
– नूतन गर्ग (दिल्ली)

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