तस्ला उठाए चली जा रही जर्जर काया,
कोयले-सी काली ज्येष्ठ की दोपहरी में।
किसी आवाज़ पर तेज़ होते थके क़दम,
पेट जल रहा,फिर भी कर्मों पर जोर-
जो लिखे हथेली में।
दिन में तन जले,रात को मन,जलना जीवन,
रोम-रोम जलता जले,दुनिया तज कहाँ चले रे।
दिनभर की थकन,तपन बढ़ती है चले रे,
हद हो जाए उस पल,चूल्हे की राख ठण्डी-
पड़ी मिले रे।
बीबी,बच्चे एक कोने में चुपचाप,गुमसुम,
मानो मर गया हो कोई हृदयी रिश्तेदार।
अचानक सुबह की बात स्मृति पटल छायी,
मालिक से पग़ार लाना,माथे हाथ रख रोया-
मज़दूर लाचार।
यूँ पत्थर-सा गिरा झूल गई खटिया कमज़ोर,
हाथ फेर नन्ही बच्ची ने गालों पर चेताया।
कहाँ खो गए बापू? आँखें खोलो,फ़िकर न करो,
आज मेरी गुड़िया ने व्रत रखा है,हमने भी-
आपने क्यों भुलाया।

आँखों से स्नेह-गंगा बही,भूल गया भूख सारी।
निन्दिया ने झूला-झुलाया,बीत गई रैन सारी।।

-राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”

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