गर्व से जीना सीख लिया

गर्व से जीना सीख लिया

नहीं कर सका कभी ऐसा कुछ
कि कोई मुझ पर नाज़ कर पाये
प्रतिबिम्ब देख कर स्वयं का
नेत्र स्वयं से नज़र ना मिला पाये
सोचता था प्रभु ने मुझे ऐसा ही बनाया है
नहीं बक्षा कोई हुनर कुछ कर दिखाने का
छुपकर मूषक की तरह बिल में रहता था
नहीं साहस किया कभी सर ऊँचा उठाने का
किंतु एक दिन ऐसा आया एक वीर सिपाही को
मैंने तिरंगे में लिपटा पाया।
हज़ारों हाथों में फूलों की माला देखी
सलामी देती हुई बंदूके देखीं
माँ की रोती हुई आवाज़
कर रही थी अपने पुत्र पर नाज़
पिता की आँखों में आंसू देखे
किंतु सर गर्व से ऊँचा उठा देखा।
पुत्र कह रहा था मैं जाऊंगा पिता की जगह
अपने देश को बचाने को दुश्मनों को हराने को
उम्र का था बड़ा कच्चा,किंतु इरादा था बड़ा पक्का।
बातों में उसकी विश्वास झलकता था
कुछ कर दिखाने का जज़्बा आँखों से टपकता था
नन्हें बालक की इस पुकार ने मुझे
झंकझोर कर रख दिया।
एक नन्हा सा बालक मेरा
प्रेरणा स्त्रोत बन गया
देख उस परिवार का साहस
डर मेरा जाने कहाँ गुम हो गया
देशभक्ति से प्लावित भावना का साज
मेरे दिल में बज गया।
देश का प्रहरी बनने का
मैंने मन में ठान लिया
निकल पड़ा मैं बिल से बाहर
सर पर साफा बांध लिया।
नन्हे बालक के एक वाक्य ने
देश का रक्षक मुझको बना दिया
सर उठाकर जीना मुझको सीखा दिया।
-रत्ना पांडे

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