आँखें सब कुछ जानती हैं,
सच को पूरा पहचानती हैं,
किंतु वक़्त कभी ऐसा आता है,
कि सच का गला घोंट देती हैं आँखें,
असत्य को विजयी देखकर भी,
सत्य को हारता देखती हैं आँखें,
शर्म से रिश्ता जोड़ती हैं मजबूर आँखें,
इसीलिये शर्मनाक सत्य से मुँह मोड़ती हैं आँखें,
अपनी इज़्ज़त की ख़ातिर सच को,
पर्दे के पीछे दफ़न करती हैं आँखें,
आँखें सब कुछ जानती हैं,
सच को पूरा पहचानती हैं।

-रत्ना पांडे

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *