गणेश चतुर्थी का त्यौहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि, इस दिन चंद्र दर्शन निषेध है, अगर देख लिया तो, स्यामंतक मणि की कथा सुनने का विधान है। आज जो यह रूप देखने को मिलता है, उसे हम सिनेमा जगत या मीडिया का प्रभाव कह सकते हैं। और पूरे देश में गणपति बप्पा मोरिया की धूम मची हुई है। पहले ऐसा नहीं था, पूजा पहले भी होती थी, लेकिन इस तरह पंडाल, शोर शराबा कहीं नहीं सुनाई देता था। सुनाई देता था तो बस, बच्चों द्वारा गाए जाने वाले गीत, घर घर जाकर छोटे बच्चे डांडिया बजाते थे, और अपने गीत गाते थे। गीत के अंदर, जिस #बच्चे के यहां जाते थे, उसके नाम का जिक्र गीत में करते थे। घरवाले भी उन्हें गुड़धानी या पैसे देते थे। उस गुड़धानी और हर घर से मिले पैसों का आनंद ही कुछ और था। और यही डंडा चौथ, चकड़ा चौथ के नाम से जानी जाती थी। आज घर घर गणपति विराजते हैं, पंडाल सजाए जाते हैं, लेकिन बच्चों द्वारा गाए गए वो गीत गायब ही हो गए हैं। बच्चे भी घर घर नहीं जाते, गुड़धानी तो सब भूल ही गए हैं। मुझे जरूर एक गीत याद आ रहा है, हम अलवर जिले में थे। उस समय का यह गीत शायद मुझसे लिखने में, कुछ गलत भी हो सकता है। अगर किसी और को आते हों, तो कृपया शेयर कीजिए। इसमें ना कोई जातपात होती थी, ना कोई अमीरी गरीबी। वो सौहार्द अब देखने को कम ही मिलता है।
चकड़ा चौथ भादुड़ो,
कर दे माई लाडूड़ो,
लाडूड़ा में घी घणों,
चीकू की मां में जी घणों,
छोटो सो बिंदायकड़ो,
हाथी पा से जाए थो,
हाथी पा से गिर पड़ो,
पांय लागो कांटूड़ो,
नाई के घर जाए थो,
नाई ने कांटो काढो,
धोबी के घर जाए थो,
धोबी ने दियो आधो लाडू,
कूणा बैठे खाए थो,
कूणा में सुपारी, खोपरा की पारी।

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