जैसी करनी वैसी भरनी

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जैसी करनी वैसी भरनी

By |2018-09-19T10:07:50+00:00September 19th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

करके बड़ा मेरे माँ बाप ने, ये क्या ग़ुनाह ऐ खुदा कर लिया|
सिहर जाता था जो ऊँगली छूटने पे, आज उनको ही खुद से जुदा कर दिया|
खुद कांटो में सो गए, फूलों की सेज पे रखा मुझे|
पावों में छाले पड़े उनके, पर हाथों हाथ रखा मुझे|
कर्ज लेकर भी, कमीं पैसों की न होने दी मुझको|
आज दो वक्त की रोटी को भी, मोहताज कर दिया उनको|
भूल चुका मैं लाड़-प्यार, उनके दिए अमिट त्याग को|
उनकी तकलीफों को, उनके निश्छल स्वभाव को|
मिनटों में जो पूरी कर देते थे, मेरी हरेक ख्वाइश को|
देख रहा हूँ वृधाश्रम, आज उनकी परवरिस को|
मैं ही मैं में लगा हूँ रहता, अपना भविष्य सवांर रहा मैं|
बीबी का है ध्यान मुझे, बच्चों को दुलार रहा हूँ मैं|
नहीं समझ रहा नादान हूँ, कि इतिहास फिर दुहराया जायेगा|
जो कर रहा मैं उनके साथ, वही मुझसे भी करवाया जायेगा|
मेरा बेटा बड़े प्यार से, मेरी फसलों का फल खायेगा|
फिर एक रोज मुझे मेरा लाडला, उसी वृधाश्रम में ले जायेगा|

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