चश्मा बदलिए, जैसी दृष्टि- वैसी सृष्टि!

चश्मा बदलिए, जैसी दृष्टि- वैसी सृष्टि!

पास का चश्मा, दूर का चश्मा का, धूप का चश्मा बाइफोकल, ट्राइ फोकल, मल्टी फोकल इन्हें स्पेक्स भी कहते हैं, फैशन के लिए भी गॉगल्स होते हैं और इनके अलावा एक होता है, अपने नजरिए से देखने का चश्मा।
हम सभी को दुनिया, व्यक्तियों को अपने अपने चश्मे से देखने की आदत पड़ चुकी है। अगर दुनिया को सही तरीके से देखना है तो सबसे पहले अपने चश्मे (सोच, दृष्टिकोण) को बदलना जरूरी है। जैसे ही चश्मा बदलते हैं, आप की और लोगों के प्रति धारणा भी बदल जाती है। अन्यथा हम पूर्वाग्रह से बंधे हुए होते हैं। परिस्थितियों, लोगों को देखने का नजरिया बदलने, या कहें चश्मे (दृष्टिकोण, सोच) को बदलकर देखने से, दुनिया ज्यादा सुंदर और सुलझी हुई प्रतीत होती है। जब आप अपने पूर्वाग्रहों के साथ चलते हैं, उसी नजरिए से दूसरे को देखते हैं, तो आप जिस सोच के साथ हैं, उन्हीं परिस्थितियों को देखते हैं, वह उसी पर निर्भर करेगा, और वही दिखेगा। अपनी सोच, नजरिए, चश्मे को बदलें… अनुभव के साथ उसका रिजल्ट भी बदल जाएगा, परिणाम भी बदल जाएगा। हर समय गुस्से में बोलना, या क्रोध में स्वयं को नुकसान, से कुछ नहीं होने वाला। बहुत सी शिकायतें, धैर्य के साथ बहुत बुरा देख, सुन, बोल लिया, पर अब नहीं, हरगिज नहीं। अगर बदलना है वह, जो अच्छा नहीं है, वह बदलिए। नजरिए के साथ-साथ पहले खुद को बदलना जरूरी है। फिर अपने नजरिए, अपनी सोच को बदलो। हर चीज में अच्छा देखने की कोशिश करो। हर मुश्किल में कुछ सीखने की कोशिश करो, जिस दिन आप अपने देखने का चश्मा (नजरिया,दृष्टिकोण) बदल लेंगे, उस दिन पूरी दुनिया बदलती हुई दिखाई देगी।
कई बार आपने देखा होगा, किसी के लिए भी हम एक इमेज बना लेते हैं, और उसके बारे में वैसा ही सोचते हैं। आप अपनी मां, पिता, पति, पत्नी, बच्चों, मित्र या परिवार के बारे में कुछ भी गलत सुनने को तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि आप उनको अपने चश्मे से देखने के आदी हैं, अन्यथा गलती तो कोई भी कर सकता है… सुपर पावर तो कोई है नहीं। इसलिए सबके लिए अपना ही चश्मा लगाने के बजाय चश्मा बदलकर कर विवेक के साथ देखने की कोशिश करें। जैसे ही हम चश्मा बदलते हैं, दुनिया ज्यादा सुंदर और सुलझी हुई, हसीन महसूस होती है।
आप अपनी सोच का दायरा विस्तृत कर आगे बढ़ते रहिए। चलेंगे तो ठोकर भी लगेगी, गिरेंगे भी…तो भी डर कैसा?? गिर कर उठने में भी एक आनंद है। जब सब तुम्हारे गिरने का इंतजार कर रहे हों, कि बस अब रुक गया सब समाप्त!!!! आप एक बार फिर से उठ खड़े होते हैं… तो आपके प्रतिद्वंदी अपने आप शांत हो चुप बैठ जाएंगे। आपके एक कदम उठाते ही बाकी के निन्यानवे भी साथ हो लेंगे। और यही तुम्हारी जीत होगी!!!!!!!! स्वामी विवेकानंद का यह कथन बहुत ही सटीक है
उठो, जागो, और तब तक नहीं रुको, जब तक कि आपको अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाए। सृष्टि नहीं दृष्टि बदलने की कोशिश करें, दुनिया बहुत हसीन लगेगी।
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि!!

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