तुम हमसे रूठी हो

तुम हमसे रूठी हो

तुम जो रूठकर हमसे बैठी हो मेरे महबूब!
हमनें मोहब्ब्त का दिया दिल में जलाए बैठे हैं!!

मेरी धड़कन के धागे टूट जाएंगे तुम जो रूठोगी!
मेरा मन व्यथा हो जाएगी ज़िन्दगी बिखर जायेगी!!

मेरा प्यार भरी इस जीवन में अधूरे अनुभूतियां!
मन का सुख-चैन सब आशाएं धूलिम हो जायेगी!!

सुध-बुध, चेतना से विगल मेरा साँसें विफर हो जायेगा!
मेरे मन की सुखाड़ तेरे रूठ जाने से होना लाज़मी है!!

मैं मानता हूं हमसे खताएँ हुई होगी बहुत अनजाने में!
तुम मुझे सदैव अपने दिल से हमें निहारी होगी प्रिय!!

मुझे जो उपहार मीले तेरी मोहब्ब्त के रूप में प्रिय!
उसे मैं हरपल अपनी इस जीवन में जीना चाहता हूं!!
-प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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