किसी चेहरे पर छायी उदासी ने
मन को छुआ
द्रवित हो रहा था उसके दुःख से
पर, दूजे ही पल
किसी चेहरे की चालाकी से
भर उठा मन घृणा से
एक ही पल में कहाँ खो गयी
ह्रदय की विशालता
कहाँ गया वो अपनापन
इतनी शीघ्र अनायास ही
ह्रदय परिवर्तन
समझ में नहीं आया
बल्कि छोड़ गया एक सवाल मानस पर
क्यों कोई अपना लगता है
क्यों कोई अच्छा लगता है
किसी से कटा कटा रहता है
ये मन कैसे रूप बदलता है
छाँव कहीं, धूप कहीं
कहीं मेघ बरसता है
– वंदना शर्मा

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