कागज़ की व्यथा

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कागज़ की व्यथा

By |2018-09-21T14:01:20+00:00September 21st, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

कागज़ बोले कलम से क्यूँ इतना सताती हो,
कभी पेंसिल से तो कभी पेन की निब चुभाती हो|
कुछ लिखती हो टेड़ा मेड़ा, तो कभी सरपट लिख जाती हो|
मेरे सुन्दर साफ़ ह्रदय को क्यूँ गन्दा कर जाती हो|
इतना सुन कलम इठलाने लगती है,
मुस्कुराते हुए समझाने लगती है|
प्रिय कागज़ आप बन रहे मूरख हैं,
हम दोनों तो एक दूजे के पूरक हैं|
लगते हैं हम पूरे पति पत्नी, तू मेरा कागज़ मैं तेरी लेखनी|
तेरे साथ जुड़ने से ही तो मेरा महत्व है,
कागज़ है तो कलम का अस्तित्व है|
हम दोनों के संगम से कुछ ऐसा लिख जाता है,
जीवन के हर पहलू को अपना लेख दर्शाता है|
कभी बन जाता है मार्ग शिक्षा का, तो कभी काव्य ये कहलाता है|
– रही मस्ताना

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