पूछ रहा मुझसे स्वदेश !

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पूछ रहा मुझसे स्वदेश !

By |2018-09-22T14:10:53+00:00September 22nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

पूछ
रहा मुझसे हिमालय,

पूछ रहा वैभव अशेष
पूछ रहा क्रांत गौरव भारत का,

पूछ रहा तपा भग्नावशेष
अनंत निधियाँ कहाँ गयी,

क्यों आज जल रहा तपोभूमि अवशेष;
कैसे लूटी महान सभ्यता प्राचीन,

क्यों लुप्तप्राय वीरोचित मंगल उपदेश !
कितने कलियों का अन्त हुआ भयावह,

कितने द्रोपदियों के खुले केश,
बता,कवि! कितनी मणियाँ लुटी,

कितनों के लुटे संसृति-चीर विशेष !
चढ़ तुंग शैल शिखरों से देख!

नहीं सौंदर्य बोध,विघटन के विविध क्लेश;
कहाँ विस्मृत धधकता स्फुलिंग दुर्धुर्ष,

कहाँ कुपित काल विकराल शेष!
ज्ञान-विज्ञान अनुसंधान कहाँ गये,

कहाँ लुप्त-विलीन अरूण ललाट श्लेष,
गंगा-यमुना-सिंधु की अमिय धार कहाँ,

उद्दाम प्रीति बलिदान लेश,
कहाँ गये तप-तेज दिव्य तुम्हारे,

कहाँ प्रबुद्ध विभा तलवार वेष;
कहाँ अस्त ज्योतिर्मयी अनंत शिखायें,

बता खंडित-वीरान कैसे हुआ स्वदेश?
ओ वीर-व्रती तु कहाँ छुपे हो, पल भर भी कर ले दृगुन्मेष;
ज्वालाओं से दग्ध विकल उलझन में, तड़प रहा प्यारा स्वदेश !

– कवि आलोक पाण्डेय
वाराणसी,भारतभूमि

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कवि, लेखक , साहित्यकार

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