भूमंडलीकरण में कहीं खो ना जाए ग्रामीण मासूमियत (बालगीत)

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भूमंडलीकरण में कहीं खो ना जाए ग्रामीण मासूमियत (बालगीत)

By |2018-09-22T16:28:49+00:00September 22nd, 2018|Categories: अन्य|Tags: , , |0 Comments

भूमंडलीकरण में कहीं खो ना जाये ग्रामीण मासूमियत (बालगीत)___
आज बच्चों का बचपन कहीं खोता जा रहा है, और इसका दोषारोपण हम समाज, टीवी या समय की मांग, आदि को देकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते। बच्चों में सामाजिकता, व्यवहारिकता जैसे शून्य होती जा रही है। बच्चे अब बचपना नहीं करते, वे या तो सामान्य से कम हैं, या फिर एकदम परिपक्व शातिर, भी कह सकते हैं, जो कि कल्पना से परे है। क्या बच्चे ऐसा भी कुछ कर सकते हैं, कहीं ना कहीं हम भी इस भेड़ चाल में शामिल हैं। हम समाज को एक साथ नहीं बदल सकते, कम से कम, अपने घर की मासूमियत को तो बचा कर रख सकते हैं। हो सकता है आपको देखकर आपके आसपास में, पड़ोस में भी कुछ परिवर्तन आए और एक स्वस्थ परिवेश का निर्माण हो।
`विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की परिभाषा के अनुसार केवल रोगों का न होना ही, स्वास्थ्य का लक्षण नहीं है, बल्कि शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से सकुशल रहना ही स्वास्थ्य कर है। आपने भी बचपन में ऐसे कई खेल गीत गाए होंगे, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहे हैं। कुछ समय की मांग के साथ, कुछ परिवर्तन के साथ गाए गए हैं। लेकिन उन का भाव भूलता नहीं, मां की लोरी को न जाने कब से सुनते आ रहे हैं, जिसमें मां ने चंदा मामा के साथ एक रिश्ता ही कायम कर दिया है_____
चंदा मामा दूर के, पुए बनाएं गुड के,
आप खाएं थाली में, चीकूगुड्डो को दे प्याली में,
(जो भी अपने बच्चे का नाम हो।)
प्याली गई टूट, मिष्ठी गई रूठ,
रूठे को मनाएंगे, नई प्यालियां लाएंगे।।
ऐसी ही एक और लोरी जिसे बूढ़ी दादी से लेकर नई नई बनी मां तक गाती है_____
लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी,
दूध में बताशा, मुन्ना करे तमाशा।
और कब मुन्ना नींद के आगोश में चला गया, पता ही नहीं चला। शायद इसी को स्पर्श चिकित्सा भी कहते हैं। हल्की हल्की थपकी, बच्चे को सुकून देती है। यह बात सीडी या टीवी की लोरी में कहां???? एक और बाल गीत_ जिसमें दादी, नानी लेटकर बच्चों को पैरों पर बिठाकर झूलाती हुई गाती हैं_____
झुझू के पम्मू के, झूझू के पम्मू के,
पामन झोटा, शहर कौ लोटा,
डोकरी डोकरी हट जइयो, बालक बच्चे आवेंगे, आकर कोट गिरावेंगे, राजा जी कौ कोट गिरेगो,
अर्ररररर धम्म!!
आज बच्चों पर किताबों का जो बोझ लदा है, उसे देख दया आती है। अपना समय याद आता है, जब स्लेट या तख्ती को सुखाने के लिए स्लेट,तख्ती को जोर जोर से हिलाते जाते और गाते जाते, ऊपर से यह समझते, कि शायद हमारे गाने से ही स्लेट सूख रही है।
सूख सूख पट्टी, चंदन गट्टी,
राजा आया, महल चिनाया,
झंडा गाड़ा, बजा नगाड़ा,
रानी गई रूठ, पट्टी गई सूख,
या
राजा की बेटी सोती थी,
फूलमाला पोती थी,
और इतनी देर में पट्टी सूख कर तैयार। हालांकि पट्टी सूखने का इससे कोई संबंध नहीं था, पर बच्चे तो बच्चे हैं। अब उन्हें शांति नाम की लड़की को ही छेड़ना है, तो कोई क्या करे?????
शांति मन मानती, कहना क्यों नहीं मानती,
पंडित जी बुलाने आए, बस्ता क्यों नहीं बांधती।।
बच्चों को पहाड़ा याद करना हो वह भी सत्रह का फिर एक तुकबंदी, बच्चों के पास हर मौके के लिए कुछ न कुछ होता था।
सत्रह एकम सत्रह, बेबी का कान कतरे,
बेबी के कान में मोती,सत्रह दूनी चौंती।। (चौंतीस)
तीज त्योहारों पर झुंड के झुंड बच्चे, सुबह ही नहा धोकर तैयार, घर घर जाकर टेसू, झांझी के गीत हों, या भादों में गणेश चौथ, सुबह ही निकल पड़ते, तो टेसू झांझी के लिए रात को। लेकिन अब बच्चे तो बच्चे क्या मांएं भी इतनी सहज और उदार हैं????? उनकी निगाह में यह सब गरीब और गंवार बच्चों का मांगना, खाना है। पर पहले एक बाल सुलभ सहज भाव, छोटे घर के भी वही बालहठ, व अमीर बड़े सेठ के यहां बच्चों के भी वही आनंद की अनुभूति। भादवा की गणेश चतुर्थी पर जिसे डंडा चौथ भी कहते हैं, राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोकगीत याद आ रहा है। बच्चे घर घर जाकर डंडा बजाते हुए गाते हैं, तथा पैसे या गुड़ धानी की मांग करते हैं_______
चकड़ा चौथ भादुड़ो,
कर दे माई लाडूड़ो,
लाडूड़ा में घी घणों,
चीकू की मां में जी घणों,
छोटो सो बिंदायकड़ो,
हाथी पा से जाए थो,
हाथी पा से गिर पड़ो,
पांय लागो कांटूड़ो,
नाई के घर जाए थो,
नाई ने कांटो काढो,
धोबी के घर जाए थो,
धोबी ने दियो आधो लाडू,
कूणा बैठे खाए थो,
कूणा में सुपारी,खोपरा की पारी।
इसी के साथ बच्चों का शोर सभी जाति से समान रिश्ता, कोई भेदभाव नहीं, बस अपने गुड़धानी तथा लड्डू की फरमाइश। सावन भादो में बादल होते हैं, लेकिन बरसते नहीं बादलों की लुकाछिपी को देखकर बच्चों की टोली जोर जोर से जैसे भगवान से कह रहे हों,
बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से।
बच्चों का यह बाल गीत आज भी उतना ही प्रचलित है जितना पहले था।
हरा समंदर, गोपी चंदर,
बोल मेरी मछली कितना पानी।
बच्चे गोल घेरा बनाकर पूछते और मछली बना बच्चा धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ाता जाता है। और अंत में कहता है डूब गए। खेतों पर जाते बच्चों ने प्रकृति से कैसा बना लिया, जैसे उसकी योग्यता अनुसार पदवी प्रदान की हो___
चकई के चकदम, पीपल मुकदम,
चना चौधरी, मटर गुलाम,
ठाड़ी सरसों करे सलाम।।
जैसे उत्तरी भारत में होली जलाई जाती है वैसे ही पंजाब में लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है यह संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है।
सुंदर मुंदरिए_ हो
तेरा कौन विचारा_ हो
दुल्ला भट्टी वाला_ हो
दुल्ले धी ब्याही_हो
सेर शक्कर आई_ हो
कुड़ी दे बोझे पाई_ हो
कुड़ी दा लाल पटारा_ हो
कौन था यह दुल्ला भट्टी वाला, इसकी क्या कहानी है, जिसे आज भी याद किया जाता है। पर भला बच्चों को इस से क्या सरोकार!!!! बच्चे आज भी इस गीत को गाकर पंजाब में लोहड़ी के लिए लकड़ियां, रेवड़ी, मूंगफली एकत्रित करते हैं, तथा मूंगफली, तिल रेवड़ी व मक्की के फूले अग्नि में डालकर पूजते हैं, तथा मिल बांट कर खाते हैं। एक और बाल गीत देखिए, जिसका कोई ओर छोर नहीं बस केवल तुकबंदी है____
कहानी पोदा रानी, पोदा गई पानी,
पानी से लाई गुड़ धानी,
गुड़धानी को खागया ऊंट,
ऊंट करी लीद,लीद को ले गया कुम्हार,
कुम्हार ने बनाए बर्तन, बर्तनों को ले गया जोगी, जोगी ने दिया भात, और बिट्टू पसारे हाथ,
और किट्टू कहे हम्मम बड़ा मीठा!!!!!!
ये गीत ना जाने कब सृजित हुए, किस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी एक लय में बंधते चले गए, जो कल भी थे, आज भी हैं, और इन्हीं परंपराओं को बनाए रखने में आगे भी सहयोगी रहेंगे। लेकिन इसमें बड़ों का सहयोग भी जरूरी है। हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की इस तरह हाथों की पालकी बनाकर न जाने कितनी बार आप भी झूले होंगे। बच्चों को किसी लयताल की जरूरत नहीं, उन्हें तो बस अपनी खुशी जाहिर करनी है, कोई शब्दों का बंधन नहीं, कहीं कोई छंद, दोहे का दबाव नहीं, वह तो बस अपने बालपन का राजा है। इन बाल गीतों को ध्यान से सुनें,उसमें कई तरह की भावनाओं का समावेश सुनाई देगा। गीतों के जरिए वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं__
अक्कड़, बक्कड़, बंबे बो,
अस्सी, नब्बे,पूरे सौ,
सौ में लगा ताला, चोर निकल कर भागा,
टूटी घर की चिड़िया बोली
चांई चूई चस, मैदान बोला भस।
एक गली में आना-जाना, दुई गली में बम,
अंग्रेज साला क्या करेगा राज करेंगे हम।।
अब जरा इस गीत में बच्चों के तर्क तथा चालाकी देखिए, बच्चे एक के ऊपर एक मुट्ठी बनाकर रख लेते हैं। फिर एक बच्चा भाव बताएगा तथा दूसरा महंगा बताएगा, फिर बच्चा अपनी पहुंच बताएगा_____
बाबा बाबा आम दो,
हम भी हैं दरबार के,
हम भी हैं सरकार के,
अच्छा एक आम उठा लो,
यह तो खट्टा है,
अच्छा दूसरा भी उठा लो,
दोनों मीठे, दोनों मीठे।।
और बच्चों की खुशी देखते ही बनती है, मुट्ठी से आम बनाकर चूसते हुए, जैसे सच में ही दो मीठे आम मिल गए हों।
खेल गीत हो और उसमें बूढ़ी अम्मा शामिल ना हो, यह तो हो ही नहीं सकता। सारे बच्चे एक अम्मा बने बालक को चिढ़ा कर उटपटांग बातें कर रहे हैं, और अम्मा अपनी पैसे रखने के लिए थैली सिल रही है___
बूढ़ी अम्मा बूढ़ी अम्मा, कहा कर रही है?
कोथरी (थैली) सीं (सिल) रही हूं,
कोथरी कौ कहा करेगी,
बा में पैसा धरूंगी,
बिन पइसन कौ कहा करेगी?
और इस तरह आगे से आगे प्रश्न-उत्तर चलते रहते हैं, और अंत में अम्मा की थैली चोरी हो जाती है। और अम्मा बना बालक सब बच्चों को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ता है।
प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने शायद इसीलिए कहा है, हमारे ग्राम में जीवन में इतना भांति भांति का मसाला भरा पड़ा है, जितना हमारे इतिहास ग्रंथ भी नहीं बता सकते। लोकगीत (वाचिक) संपूर्ण जीवन की समृद्धि को अवगत कराता है। क्वार, कार्तिक में गाए जाने वाले टेसू और सांझी, झांझी के गीत हो या सावन में गाए जाने वाले मल्हार, जिसमें छोटी छोटी लड़कियों का अपने को दूर शादी ना करने का आग्रह हो। ऐसे ही एक टेसू गीत, जिसमें बच्चे विदेशियों को कैसे ललकार रहे हैं_
इमली की जर ते निकली पतंग,
नौ सौ मोती, नौ सौ रंग,
एक रंग मैंने मांग लियो,
चढ़ि घोड़ी पर धांग दियो,
दांगी है जी धांगी है, दिल्ली जाहि पुकारौ है,
दिल्ली की है ऊंची कोट, मार सिकंदर पहली चोट,
चोट गई चूल्हे की ओट, फिरंगी बैठो कूंड में,
दै सारे के मूंड़ (सिर) में।।
कहीं खो न जाए ये धरोहर, इन बाल गीतों की गति, इसके प्रभाव को, बनाए रखने में यह बच्चे हमेशा सहयोगी रहे हैं। इन बच्चों को साथ मिलकर खेलने दीजिए, जिससे एक स्वस्थ परंपरा कायम रह सके। ये गीत हमारी लोक की, समाज की, अक्षय संपदा है। अगर आपके पास भी कोई बाल गीत हों तो प्लीज, शेयर अवश्य कीजिए।

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