कैसे रस्ते हैं ये,
बस चलते जाना है।

मंजिल का पता नहीं
बस चलते जाना है।

टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे
कुछ खट्टे कुछ मीठे।

कभी उबाऊ, कभी थकाऊ
तो कभी इतनी मस्ती।

मन करे, वक़्त यहीं थम जाएं
न वक़्त रुकता है।

न ये ज़िंदगी रूकती है,
बस चलते जाना है।
– वन्दना शर्मा

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