कभी आंधी उड़ा ले जाती है
झरते पत्तों को सैलाब की तरह
उसी तरह कभी ज़िंदगी बिखर जाती है
और समेटना मुस्किल हो जाता है
अब हर किसी के पास तो
हुनर होता नहीं
गिरते पत्तों को लपक ले
गिरने से पहले
वो पत्ता भी कहाँ जानता किस्मत
जिस साख से टुटा और अंजाम की फितरत।
कभी पहुँच जाता है कोई अंजाम तक
तो किसी को रास्ता ही नहीं मिलता।

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