ये ढ़लती सी अश्रुत गोधूलि अकेली

ये ढ़लती सी अश्रुत गोधूलि अकेली

ये ढ़लती सी अश्रुत गोधूलि अकेली,
बो बदरंग बियावान शाम किनारा,
कोई चला गया क्षितिज से परे,
न जाने कब मिलना हो दोबारा

ये अर्क फिर आयेगा,
फिर महकेगा शाम किनारा,
पुलकित व्योम पर फिर से होगा,
सुरचापि रंगों का बसेरा।

पर वो रवि न जाने कब आएगा,
जो मिटा सके मेरे हृदय विषाद,
कब आयेगा वो  सप्तवर्णी दिनांत,
जो रोक नेत्र वारि दूर करे अवसाद।

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