सच की हार

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सच की हार

By |2018-09-28T12:01:45+00:00September 28th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

देखो स्थिति क्या बेबस हो गयी,
सच से झूठ की बहस हो गयी|
बहस हो गयी, सच पे झूठ पड़ गया हावी,
सच बेचारा कोने बैठा, सोचे कहाँ खराबी|
सच ही तो बोला था, ऐसा क्या जुल्म कर दिया,
वाहवाही लूट रहे झूठे, मैं बस चुपचाप पड़ गया|
मैं बस चुपचाप पड़ गया, सत्य से जीत गयी मिथ्या,
भरी अदालत मैं यारों कर दी गयी मेरी हत्या|
कुछ को खरीद लिया दौलत ने, तो कुछ धमकी से डर गये,
सच को कुचल दिया क़ातिल ने, मुल्ज़िम हंस के घर गये|
सच्चाई सिमट के निर्बल और लाचार हो गयी,
यहाँ झूठ बोलने वालों की जय जयकार हो गयी|
झूठ बोले कऊआ काटे ये हो चला पुराना है,
झूठ बोले तलुआ चाटे वे जीते सारा जमाना है|

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