शायरी (हार जीत)

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शायरी (हार जीत)

कभी था मैं मुकम्मल जवाब जिनके सवालों का
के अब मैं खुद उनका एक सवाल बन गया हूँ
इम्तिहानों के इस दौर में न समझ आ रहा के
हर एक पल मैं यूँ ही क्यों बिखरता जा रहा हूँ।।

न समझ पा रहा कि क्या करूं मैं इसका
कि ये कैसा है इम्तिहान हो रहा ज़िन्दगी का
था जवाब मैं कभी, पर अब खुद सवाल हूँ
कहाँ से लाऊं जवाब इसका जो खुद सवाल हूँ।।

बस शर्त इतनी सी है मेरी हर सवाल से- के
वो साथ खड़े हों मेरे हर कदम दुनियाँ की भीड़ में
मैं उलझ सा हूँ कश्मकश की ज़िन्दगी में तो क्या
हर जंग जितने का हुनर मैं आज भी रखता हूँ।।

बिना सांसों, बिना ज़िन्दगी के जंग लड़ता है कौन
बिना रूह इस बेजां की कीमत लगाता है कौन
है जो तू मेरा हमसफर हमदर्द हर लम्हा हर कदम
तो मंजिल फ़तेह से मुझे हिला सकता है कौन।।

मेरी जिंदगी मेरी हर ख़ुशी का राज हो तुम
मेरे हर गीत के संगीत का साज हो तुम
अब कैसे और क्या-क्या बताऊँ किसको
कि मेरी ज़िन्दगी का राज-ए-ताज हो तुम।।

न थी, न है और न होगी कभी
ये ज़िन्दगी मुकम्मल तेरे बगैर
तू है तो सब हैं खुशियाँ दुनियां की
तू नहीं तो कुछ भी नहीं तेरे बगैर।।

बिना तेरे अब तो सिर्फ साँस आती जाती है
एक पल को भी दिल से तेरी याद जाती नहीं
मेरी आँखों में सपने तेरे थे तेरे हैं तेरे ही रहेंगे
पर वो ख़ुशी के दिन हँसी की रात आती नहीं।।

– सुबोध उर्फ़ सुभाष

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