अधूरा सफ़र
ये गीत  मेरे यार द्वारा सुनाई गई एक घटना से प्रेरित होकर लिखा है कि कोई किस तरह से अपनी ज़िन्दगी से यूँ मुह मोड़ सकता है सीधे कहूँ तो क्या आत्महत्या ही एक हल है?

ऐ मुसाफिर जाने वाले
लौट के फिर न आने वाले
यूँ ना जा तू मुह मोड़ के

यूँ प्यार का दामन छोड़ के
दिल अपनों का तोड़ के
संग जीने की थी कसमें,
संग जीने के थे जो वादे
जग से सारे रिश्ते नाते तोड़ के
जाते जाते ओ…
जाते जाते ऐ मुसाफिर इतना बता
जा रहा तू किस मंजिल की खोज में-2
ऐ मुसाफिर जाने वाले
लौट के फिर न आने वाले
यूँ ना जा तू मुह मोड़ के

यूँ जो तू है जा रहा
के अब है जा रहा
सुन ले मेरी भी कुछ बन्दगी
ओ…आ………
यूँ जो तू है जा रहा
के अब है जा रहा
सुन ले मेरी भी कुछ बन्दगी
जिनको तूने अपना समझा
कुछ ने अपना समझा आपको
जाते जाते ओ…
जाते जाते सबको इतना बता दे
तू क्यों है जा रहा
किनसे मुह मोड़ के
तू क्यों है जा रहा
यूँ हमको तनहा छोडके
जाते जाते इतना बता दे…ओ…….
हाँ जाते जाते इतना बता दे
हम जियेंगे किसके लिए
ऐ मुसाफिर जाने वाले
लौट के फिर न आने वाले
यूँ ना जा तू मुह मोड़ के.

– सुबोध उर्फ़ सुभाष

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