लबों पर हंसी

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लबों पर हंसी

लबों पर हंसी
सभा मे संबोधन हैं और मैं हूं!
लबों पर हंसी है और मैं हूं!!

हमें वें ख्वाब दिखाते हैं!
हमसे ही वें ख्वाब को तोड़ते हैं!!

ये जातियों की पाठ भी पढ़ाते हैं!
ये गरीबी के नाम पर रोटियां भी सेंकते हैं!!

ये सभी मजहबों में भी सरीख होते हैं!
ये हैं इनकी सियासी थालियां हैं और मैं हूं!!

ये तरह-तरह के खेल भी खेलते हैं!
कभी दंगा तो कभी डाका तो कभी
आतंक के नाम पर निर्दोष का लहूं भी बहाते हैं!
बहुत शान और शौकत से कहते हैं मैं हूं!!

सभा में संबोधन हैं और मैं हूं!
लबों पर हंसी हैं और मैं हूं!!
– पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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