संदियों से सहते आए हमसब

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संदियों से सहते आए हमसब

संदियों से सहते आए हमसब
बहुत हुआ सर झुका के चलना
हम भी अब उठ के उनका सामना करेगें!

अपना पाखड़ भरा भाषण नही चाहिए
खोखले दलीले अब हमें नही चाहिए
जातियों के नाम पर अब हम बर्दास्त
लूटना अब तुम्हें बंद करना होगा

दिमाग और दिल से पनपता है
हसरतें अब हमें भी चिल्लाना आ गया!
झूठे और मक्कारी बातों से बहुत रहूं
बहाया हमनें जो मर-मिटे धर्मों के नाम पर!

अब वो दौर आ गया है हमें भी अपनी
होने का वजूद और अधिकार पाना आ गया!
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।
04/10/2018

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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