आंखों ने आंखों से इशारा किया
दिल में हलचल हुआ फिर इकरार

धीरे-धीरे मुलाकात में तब्दील हुए
कब जाने प्यार हो गया इस दिल

जिस अंधेरी रातों से डरते थे आज
अब इन आंखों में नींद और चैन कहां

पूरी-पूरी रातों को उसकी यादें सतानें
जब पलके झपके उसी के लिए ख़्वाब

दिन प्रतिदिन मिलना अब आदत सी
उसके बारे में सोचना मेरी हिसा बन गया

मोहब्ब्त जब चर्म से ऊपर हो गया तो रहना
एक दूसरे से पागलपन से बढ़कर हो गया

जब समाज के रूढ़िवादी ढांचा में फसें तो
यह इल्म हुआ मैं किसी और जाती का तो

एक दूसरे से बिछड़ना पड़ा और आखिरकार
समाज के बनाएं नियमों में पड़ कर अलग हो गए

भले ही इस संसार के नियमों से अलग हो गए हम
एक दूजे की यादों से मोहब्ब्त हो गया और यादें

जिसे कभी मोहब्ब्त में दिए हुए तौफे आज वें बड़े
अजीज से लगने लगें जिसे कभी हमनें मना किया

अब उनकी बातें को दिल मे दिया जलाए बैठे हैं
कभी प्यार में जगा करते थें अब उसकी जुदाई में!!

प्यार की लकीरें शायद उस परमात्मा ने हमारे हाथों
में लिखना ही भूल गए हो ये सोचकर “प्रेम” ख़ामोश!!
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय रांची,
झारखंड भारत।
06/10/2018

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