बरगद का पेड़ (बरगद होने का सुख)

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बरगद का पेड़ (बरगद होने का सुख)

By |2018-10-07T09:54:18+00:00October 7th, 2018|Categories: अन्य|Tags: , , |0 Comments

बरगद का पेड़ (बरगद होने का सुख)
अब नहीं लुभाता, बचपन से लुभाता रहा है मुझे बरगद का पेड़। क्योंकि सभी बड़े भैया की तुलना करते थे बरगद से, जैसे बरगद की छांव में सभी विश्राम करते थे, सुकून चैन पाते थे, चौपाल लगती थी, गन्ने के रस वाले की रेहड़ी लगती थी, साइकिल के पंक्चर जोड़ने वाला भी ठौर पाता था, और अल्लसुबह हम बच्चे उसकी जटाओं, जड़ों को जोड़ झूला झूलने की कोशिश करते थे। ऐसे ही भैया भी पिता के स्वर्गवास के बाद बरगद हो गए, उन की छाया में जो वह कह दें, ब्रह्मवाक्य मान खुद को धन्य समझा। सुरक्षित महसूस किया!!!!!! समयांतर, फिर पता चला, बरगद के नीचे कोई छोटा पौधा या घास तक अपनी जगह नहीं बना पाती, क्योंकि उनमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने की हैसियत (हिम्मत, हौसला) ही नहीं होती। और मुझे लगा मेरे भी अस्तित्व की लड़ाई में बरगद भाई हावी हैं। वह दया करने में, आश्रय देने में, बड़प्पन लेने में तो खुश हैं, लेकिन मेरी पहचान मेरा वजूद बनने में उन्हें तकलीफ है। मैं भी स्थापित होना चाहता हूं, बरगद ना सही, पर मैं भी कहीं जड़ें तो फैला सकूं, कहीं तो मैं भी स्वयं, बिना बैसाखी, खड़ा हो सकूं। यही नागवार है! भाई के लिए, समाज भी मुझे एहसान फरामोश कह कर खुश है। क्या अपना वजूद तलाशना या बनाना गुनाह है? और अगर गुनाह है, तो भी मैं यह गुनाह करूंगा। घुट घुट कर जीना भी आत्महत्या जैसा ही है, और मैं यह पाप नहीं करुंगा।
शायद इसीलिए मुझे नहीं लुभाता, अब बरगद का वह बचपन वाला पेड़! क्योंकि बरगद नहीं देख सकता किसी को अपने स्तर तक आते हुए।

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