ताश के ५२ पत्तों के जैसा ही रहा,
हमारी उम्र का ढलता ५२ साल|

क्या पाया अब तक मालूम नहीं,
मगर जो खोया, उसी का है ख्याल|

पत्ता -पत्ता जोड़कर बनाया था,
अरमानों का हमने सुंदर महल|

मगर एक फूंक तकदीर ने मारी ,
बिखर गया मेरे सपनों का महल|

फिर से जोड़े पत्ते, फिर किया प्रयास,
नए थे मनसूबे, नए थे ख्वाबी-ख्याल|

विश्वास था, एक आस थी मेरी,
शायद ईश्वर करेगा कुछ ख्याल|

मगर उसने भी खेला मेरे जीवन से,
पाले में अपना शातिर मोहरा डाल|

सब्र मेरा हार गया मेरी ज़िद के आगे?
मगर होंसले तो बुलंद है मेरे बहरहाल|

ना मेरा इंतज़ार खत्म हुआ, ना इम्तेहान,
तकदीर उस पर बिछाती साजिशों के जाल|

अब क्या खेलती रहूँ अपने पत्तों के साथ!
उम्र के इस पढाव पर,मन में आता है सवाल|

Say something
No votes yet.
Please wait...